कई वर्षों से दुनिया मे प्रत्येक
व्यक्ति का किसी न किसी के साथ कोई न कोई रिश्ता जरुर होता है अब चाहे वे रिश्ता
दोस्ती का हो या प्यार का, दुश्मनी का हो या तकरार का, कोई न कोई व्यक्ति किसी
प्रकार से किसी न किसी व्यक्ति से जुड़ा रहता है, जी हाँ क्यों कि दुश्मनी का भी
अपना अलग रिश्ता होता है जो दुश्मन आपकी नाकामियों को उभारकर आपके सामने लाता है
ताकि आप उसे समय पर ठीक कर जल्द अपने लक्ष्य तक पहुँच सके|
“रिश्ता” जो एक धागे कि तरह होता है जिसके एक सिरे पर सच्चाई तो
दूसरे सिरे पर ईमानदारी होती है ओर जब तक उस धागे मे तारतम्यता बनी रहती है तब तक
आपका रिश्ता अच्छा बना रहता है जिस दिन धागा टूटता है उस दिन सब कुछ खत्म हो जाता
है इसलिए आज के इस आधुनिक युग मे अमूमन रिश्तों के बदलते माईनो के पीछे कही
उपभोक्तावाद को माना जा रहा है तो कहीं पश्चिमी सभ्यताओं का आवागमन|
बात अगर करें, 90 के दशक के बाद की, जब
देश मे उपभोक्तावाद की बहाली हुई, और देश मे पश्चिमी सभ्यता को अपनाया जाने लगा,
तो तभी से एक बदलाव हमें रिश्तो मे भी देखने व मेहसूस करने को मिला, जी हाँ हम बात
कर रहे है उन रिश्तों की जिसमे व्यक्ति की भावना उनके विचार, उनकी सोच और उनके
संस्कार जो उनकी तहज़ीब मे झलकते है लेकिन आज के इस आधुनिक युग मे हम इन सभी से
मेहरुम है जिसका कारण है पश्चिमी सभ्यताओं से आई एक नई मानसिकता का है जो प्रत्येक
युवा पीड़ी के दिलों – दिमाग मे मानों ऐसी लग गई हो, जैसे “ लकड़ी मे दिमक” |
जी हाँ, आजकल की
युवा पीड़ी जहाँ शरीर पर रंग बिरंगे “ टैटू” गुदवा रही है और साथ ही पुरुषों के साथ – साथ स्त्रियां भी
तम्बाकू, सिगरेट व मदिरा का सेवन भी कर रही है, वहीं इन सभी चीजों के साथ साथ हम
युवा पीड़ी के बीच एक ऐसे रिश्ते को पनपता देख रहे है जिसे हम Living Relationship के नाम से जानते है, लेकिन आज कल की युवा पीड़ी जहाँ इस रिश्ते को सही मानती
है वहीं समाज इस रिश्ते के बिल्कुल विरुद्द है, कारण, इससे समाज मे एक अलग तरह के
रिश्ते का पैदा होना, जो हमारी भारतीय संस्कृति के खिलाफ है|
दूसरी तरफ अगर हम बात करे पारिवारिक
सम्बंधों कि तो हमें इस आधुनिक युग मे ये देखने को मिलता है, कि जहाँ एक व्यस्क
वर्ग का व्यक्ति या यूँ कह लो घर का मुखिया, जिससे उस व्यक्ति की आमदनी से घर की
रोजी रोटी और बच्चो की पढ़ाई लिखाई चलती हो, वह व्यक्ति अपनी पूरी जिन्दगी कमाने
और मेहनत करने मे निकाल देता है जिससे जब वे अपने घर मे थक हार कर आता है तो उसके
पास इतनी हिम्मत नही होती की वे घर के बच्चों व बूढ़ो के साथ बैठकर दो बाते कर सके|
क्यों कि इस आधुनिक युग
मे जहाँ उपभोक्तावाद और बढ़ती महंगाई जिस व्यस्क वर्ग के व्यक्ति की आमदनी पर भारी
पड़ रही हो, वहीं वे अपने बढ़ते काम से अपने रिश्तो का सम्बंधों का ठीक ढ़ंग से
ख्याल नही रख पाता जिससे उसे दो चीजों
के बीच चुनाव करना पड़ता है “ पैसा“ या “रिश्ता “ और शायद यही कुछ वजह भी है आज कल के पारिवारिक रिश्तों में
तकरार की|
आज के इस आधुनिक युग
मे जहाँ व्यक्ति संचार के तमाम उपकरणों के सहारे आसानी से जुड़ता है और तरह – तरह
की जानकारी तक वो पहुँचता है तो एक ओर उसे ऐसी सूचना भी मिलती है जो मीठे से
रिश्ते को कड़वाहट में बदलने मे जरा भी देर नही लगाती, चाहे वो दौलत के लिए बेटा,
बाप का कत्ल करे या भाई, भाई का या अपने खास रिश्ते भी दुश्मनी मे कब बदल जाए इसका
हमे पल भर भी नही पता चलता|
रिश्तों के इन सभी पहलूओं को
जानकर व समझकर आज हम जिन रिश्तों से महरुम है क्या भविष्य मे भी हम फिर से इन
रिश्तों के बदलते माईनो को बदलने मे कामयाब हो पाएंगे, ये तो अब आने वाली पीड़ी पर
तय है कि क्या वो पश्चिमी सभ्यता को अपनाएगी या भारतीय संस्कृति को, लेकिन अभी के
लिए इनमे क्या बदलाव होगा, ये आने वाली पीड़ी और हमारे लिए एक बड़ा सवाल है|
( अनुज कुमार )