Friday, 11 October 2013

समझो तो बहुत कुछ और न समझो तो कुछ भी नही


रविवार 6 अक्टूबर| आई.एन.ए मार्किट दिल्ली हार्ट के पास सुबह के समय कई अलग-अलग कॉलेज से आए नुक्कड़ नाटक करने वाले लोगों का जमावड़ा लगा हुआ था जो काफी ज़ोर शौर के साथ अपना नुक्कड़ नाटक कर रहे थे, कही डफली कि आवाज तो कही निर्भया कि चीख इंसाफ की मांग करती, तो कहीं बाल मजदूरी को जड़ से मिटाने कि आवाज बुलंद हो रही थी, और यही सब, वहाँ खड़े लोगों को खूब आकर्षित कर रही थी, इसी बीच नाटक कर रहे लोग खूब तालियां बटौर रहे थे इसमे कोई शक़ नही के नुक्कड़ नाटक कर रहे छात्र अपने नाटक को बेहद आकर्षक तरीके से पेश कर रहे थे, पर पता नही उस बीच शौर कर रहे उमदा कलाकारों के बीच से मैं परे हटकर एक पेड़ के पास आकर बैठा|
         तभी मैने इस बच्चे को देखा, जो अपने गले मे गत्ते का बॉक्स लटकाकर हाथों मे दोनो लकड़ी लिए उसको बज़ा रहा था, ये छोटा बच्चा जिसे नुक्कड़ नाटक का मतलब भी नही पता होगा, वो भी नुक्कड़ नाटक कर रहे लोगों से inspire हुआ और अपना नाटक भी शुरु  किया, मेरी इस बात का बस इतना तात्पर्य है कि आज दुनिया मे हर इंसान किसी दूसरे के मुख से निकली बात सुनता है और समझता है फिर उस पर अपनी प्रतिक्रिया करता है और कोई – कोई तो सुनकर भी अनसुना कर देता है ऐसे मे इस बच्चे को कौन सुनेगा जो बिना कुछ कहे ये बयान करना चाहता है, कि वो तो नाटक कर रहे, मैं तो जीता – जागता सबूत हूँ इस हालात का जो मेरी गरीबी कि वज़ह से मुझे मिला है ये तो कभी - कभी नाटक करने आते है लेकिन मैं तो आपको यहीं मिलूंगा, मेरे लिए न कोई ताली बजाता और न ही मेरी कोई सुनता है| क्यों कि ये दुनिया नाटक करने वालो को वाह... वाही देती है और हमे फटकारती है, जो पीठ पीछे बुराई करे लोग उसे अपनाते है, और जो सच्च बोलकर अपने मित्र को वास्तविकता से रू-ब-रू कराता है तो उससे मित्र भी दूरी बनाने लगते है और कहते है कि मुझे मत समझा क्या करना चाहिए और क्या नही|
      दोस्तो अगर मेरी बात किसी के दिल को आहत पहुँचाती है तो उसके लिए मैं माफी मांगता हूँ, पर मेरा ईरादा किसी का दिल दुखाने का नही, बल्कि इस तसवीर के माध्यम से अपनी बात को आपसे साझा करना था|       

                                                     धन्यवाद

No comments:

Post a Comment