Tuesday, 20 December 2011

कश्मीर भारत का अभिन्न अंग

कश्मीर, अगर हम बात करें कश्मीर की तों इसे भारत का अभिन्न अंग तो माना जाता ही है साथ ही इसे धरती पर ज़न्नत भी कहा जाता है इसकी प्राकृतिक खूबसूरती देखते ही बनती है जो इसे  बर्बाद भी कर रही है कारण न तो यह पूरी तरह भारत का अंग है न ही पाकिस्तान का और न ही ये स्वतंत्र है
कश्मीर समस्या का जो सबसे बड़ा कारण है वो हे कुछ लोगों का इस्लाम के बारे मे गलत प्रचार करना, ओर कश्मीर मे रह रहे हिन्दु लोगो को धर्म परिवर्तन करने के लिए उन पर ज़ोर डालना ओर न मानने पर उन पर तथा उनके परिवार के लोगो पर अत्याचार करना, ये खतरा आज से नही बल्कि तब से है जब से कलिंग युद्द जितने के बाद अशोक ने बौद्द धर्म का प्रचार करना शुरू किया था और कश्मीर भी गए थे उस समय वहां भारी तादाद मे हिन्दु रहते थे जिन्होने बौद्द धर्म अपनाया था और उसके बाद आज़ादी के बाद जब दोनो देशों के बीच कश्मीर समस्या उभर कर आई तो कश्मीर मे रह   रहे हिन्दुओं पर तभी से अत्याचार होने लगा, किसी के घर जलाए जा रहे थे तो किसी कि माँ बहल को उठा लिया जाता था, इसी तरह से उन निर्दोष लोगों पर कई अत्याचार होते रहे, यह समस्या विश्व स्तर पर पूरी दुनिया के सामने उभर कर आई जिसे सुलझाना आज़ तक हर किसी के लिए चुनौतिपूर्ण रहा?
                                                                                          एक और कश्मीर समस्या का कारण कांग्रेसी नेता पंडित ज़वाहर लाल नेहरु को भी माना जाता है जो आज़ादी के समय में भारत के प्रधानमंत्री थे, और उनके द्दारा ही कश्मीर मुद्दे की रिर्पोट को U.N.O मे रखा गया था, जिससे यह मसला विश्व स्तर पर उभर कर के दुनिया के सामने आया/ एक समय की बात है जब राजा हरि सिंह कश्मीर की बाग डोर संभाल रहे थे और भारत के गर्वनर ज़नरल के पद के लिए भी उन्होने मांउटबेटन को एक पत्र लिखकर उस पर हस्ताक्षर किए, तो यह बात कश्मीर मे बैठे शेख़ अब्दुल्ला और पंडित ज़वाहर लाल नेहरु को रास नही आई, क्यों कि इन दोनो की आपस मे साठ-गांठ बनी थी और दोनो की मित्रता इतनी घनिष्ठ थी कि ज़वाहर लाल नेहरु ने शेख़ अब्दुल्ला को कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त किया/
                       शेख़ अब्दुल्ला के प्रधानमंत्री नियुक्त होने के बाद आपको उसके तीन चेहरे देखने को मिलते, घाटी मे मुस्लिम साम्प्रदायिकता वादी का, जम्मू मे क्रांतिकारी सुधारक का और शेष भारत मे प्रखर राष्ट्रवादी व सेकुलरिस्ट का, इस तरह पंडित जवाहर लाल नेहरु उसको और उसके अंतर्मन को उसके साथ रहकर भी पहचान न सके, और सरदार पटेल ने उनको ओर उनके अंतर्मन को दूर रहकर भी पहचान लिया, लगता है कि ज़वाहर लाल नेहरु जी उनकी मित्रता मे अन्धे हो गए थे, 
                                                                                          जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी का ज़म्मू कशमीर दौरे के दौरान जम्मू-कश्मीर की राजधानी श्रीनगर में वहां के प्रधान मंत्री श़ेख अब्दुल्ला के बन्दीगृह मे प्रणान्त हो गया तो आकस्मिक निधन के समाचार से पूरे देश मे शोक की लहर फैल गई थी, कलकत्ता मे उनकी विराट शव यात्रा मे पूरा बंगाल ही क्या मानो पूरा देश उमड़ पड़ा था/ डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बिना प्रवेश पत्र लिए जम्मू-कश्मीर राज्य मे पूर्ण स्वास्थय शरीर के साथ प्रवेश किया था, उन्हे शेख अब्दुल्ला के हुकुम पर तुरन्त गिरफ्तार कर श्रीनगर भेजकर एक मकान मे नज़रबन्द कर दिया गया, उस नज़रबन्दी काल मे उनकी बीमारी की कोई सूचना किसी को नही दी गई थी, केवल उनकी मृत्यु की ही सूचना ही दी गई, तब उस समय करोड़ो उंगलीयां शेख़ अब्दुल्ला की ओर उठी, और बंगाल के एक कांग्रेस मुख्यमंत्री डॉक्टर बिधान चन्द्र रॉय ने शेख अब्दुल्ला को तार देकर पूछा था, कि डॉक्टर मुखर्जी के पारिवारीक चिकित्सक होने के नाते उनकी अवस्था की सूचना उन्हे क्यों नही दी गई/
                                              उस समय मुखर्जी प्रथम लोकसभा के गठन के कुछ महीनो बाद ही सितम्बर 1962 मे कश्मीर गए थे/ और जम्मू की एक विशाल जनसभा मे उन्होने घोषणा की थी मैं आपको भारतीय संविधान के अंतर्गत लाऊंगा, अन्यथा इसके लिए में अपना बलिदान दे दूंगा/
                                                                                                                 उन्होने अपना वचन निभाया, उन्होने कहा कि जम्मू-कश्मीर प्रजा परिषद के एक देश मे दो प्रधान, दो विधान, दो निशान नही चलेंगे नही चलेंगे, फिर श्यामा प्रसाद जी की मृत्यु को समूचे देश ने उनके आत्मबलिदान के रुप मे देखा था, इस त्रासदी के डेढ़ महीने के भीतर ही पंडित जवाहर लाल नेहरु के आदेश पर उनके अन्यय मित्र श़ेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी के समाचार सुनकर देश को साहसा विश्वास नही हुआ, क्या सचमुच ऐसा हो सकता है/ यदि उस समय मुखर्जी का आत्मबलिदान नही हुआ होता, तो क्या शेख अब्दुल्ला की  गिरफ्तारी संभव होती, यदि उस समय श़ेख को कश्मीर के प्रधानमंत्री के पद से दर्खास्त करके गिरफ्तार नही किया गया होतो तो क्या कश्मीर भारत का अंग रह जाता? इनसे भी बड़ा प्रशन यह है कि जब जवाहर लाल नेहरु ने डॉक्टर मुखर्जी की मृत्यु की जांच कि देश व्यापी मांग को ठुकरा दिया था, तो उन्होने अचानक शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार क्यों किया, पदच्युक्त क्यों किया? क्या वे भी मन ही मन श़ेख अब्दुल्ला को डॉक्टर मुखर्जी का हत्यारा समझते थे? क्या नेहरु जी डॉक्टर मुखर्जी से सहमत थे कि शेख अब्दुल्ला कश्मीर को भारत से पृथ्यकथा के मार्ग पर ले जा रहे थे
                                                     इन्ही सभी बातों को ध्यान मे रख कर ये कहा जाता है कि अगर श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान उस समय न होता तो कश्मीर, क्या भारत का अंग होता और श़ेख अब्दुल्ला से कश्मीर को भारत के अंतर्गत लाया जाता और पंडित जवाहर लाल नेहरु के सम्बन्ध श़ेख अब्दुल्ला के साथ जो थे उससे तो फिर भारत को भी खतरा होता, अगर उनका बलिदान न होता तो,
                        इतिहास बड़ा ही निर्मम होता है वह किसी लिहाज़ नही करता, यह किसी को क्षमा नही करता, यदी आज के कांग्रेसी इन निर्दोष हिन्दुओं की हत्या कि जिम्मेदारी किसी के माथें मढ़ना नही चाहते है तो वे अपने माथें को टटोलें, क्यों कि कश्मीर समस्या उन्होने ही खड़ी कि है ओर अब उसे इस खूनी मुकाम तक पहुँचाया है|                                                                                                                                   

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